आज हम एक ऐसी महान हस्ती की बात कर रहे हैं , जिनका नाम सुनते ही सेवा, करुणा और निस्वार्थ प्रेम की छवि सामने आ जाती है। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ मदर टेरेसा की।
आज ही के दिन साल 1910 में यूरोप के एक छोटे से शहर स्कोप्जे में जन्मी एग्नेस गोंझा बोयाजिजू ने क्या कभी सोचा होगा कि एक दिन पूरी दुनिया उन्हें “मदर” कहेगी?
मैसेडोनिया के अल्बानियाई परिवार में जन्मी मात्र 19 साल की उम्र में वे भारत आईं और कोलकाता के लोरेटो कॉन्वेंट में शिक्षिका बनीं। लेकिन एक दिन—दार्जिलिंग की ट्रेन यात्रा के दौरान—उन्हें यह एहसास हुआ कि उन्हें गरीबों और बीमारों की सेवा करनी चाहिए यही उनके जीवन का असली मोड़ था।
उन्होंने आरामदायक जीवन त्याग दिया और 1950 में Missionaries of Charity की स्थापना की। झुग्गियों में बीमारों को उठाना, भूखों को खाना खिलाना और अनाथ बच्चों को घर देना—यही उनका असली धर्म बन गया।
मात्र 19 साल की उम्र में एक नन के रूप में 6 जनवरी 1929 को भारत पहुंची
जिन्होंने हिंदुस्तान की धरती पर 68 साल लगातार जरूरतमंदों की सेवा में समर्पित रही ।
हालांकि हिन्दू वादी संगठनों को इनकी यह सेवा कम धर्मांतरण जायदा मालूम पड़ती थी। बावजूद इसके उनको 1979 में नोबेल पुरस्कार तो अगले वर्ष 1980 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया ।
1979 में जब उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला, तो उन्होंने शाही भोज से इनकार कर दिया और कहा—“इस पैसे से तो गरीबों का पेट भरेगा।” यही थी उनकी असली महानता।
5 सितंबर 1997 को जब उनका निधन हुआ, पूरा भारत शोक में डूब गया। साल 2016 में वेटिकन ने उन्हें संत घोषित की उपाधि से सम्मानित किया जिससे उनके मानवतावादी कार्यों को वैश्विक स्तर पर एक सम्मान मिला।
वे आज भी अमर हैं—करुणा और सेवा की मूर्ति बनकर।


